Sunday, 12 March 2017

मुक्त व्यापार - कॉर्पोरेट धोखेबाजी के लिए एक नेक चेहरा



भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की |उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है |

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प्रसंस्कृत, अस्वास्थ्यकर खाद्य (जंक फूड) और रोग के बीच के गहरे रिश्ते के बारे ठोस जानकारी होने के बावजूद भी जंक फूड उद्योग को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी जा रही है जबकि हमारे स्वस्थ खाद्य प्रणाली को कानूनों की सहायता से, या वाशिंगटन से प्रेरित "नकदी पर युद्ध" या नोटबंदी द्वारा प्रतिबंधित किया जा रहा है ।

"स्वतंत्रता" - यह शब्द अब इतना विवादास्पद बन गया है। जब हमलोग जनता के रूप में स्वतंत्रता शब्द का उपयोग करते हैं तो उसका मतलब होता है लोगों के लिए आजीविका कमाने की स्वतंत्रता, ताकि भोजन, पानी, बीज, भूमि, स्वास्थ्य, शिक्षा, ज्ञान, काम, रचनात्मकता, संचार, आदि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों का उपयोग संभव हो सके जो हमारी जिन्दगी के लिये जरूरी हैं ।
लेकिन बड़े कोर्पोरेशनों ने `स्वतंत्रता' को "मुक्त व्यापार" मान लिया है जो दरअसल कॉर्पोरेट वैश्वीकरण है , जिसके जरिये बड़े निगम और उनके नकाबपोश मालिक स्वतंत्रता के नाम पर हमारी पृथ्वी का शोषण कर रहे हैं, उसे नष्ट कर रहे हैं ।


"मुक्त व्यापार" के नियम बड़े निगमों द्वारा इस तरह लिखे गए हैं कि उन्हें भूमि का अंतिम टुकडा, पानी की आखिरी बूंद, अनाज के आखरी बीज, भोजन का अंतिम निवाला, सूचना का अंतिम बाइट, डेटा के अंतिम बिट तक के निजीकरण की स्वतंत्रता मिले। इसके लिये पृथ्वी और उसके सभी प्राणियों की स्वतंत्रता छीनकर, उनकी संस्कृति को नष्ट कर उन्हें कैद कर देने की जरूरत है जो वह कर रहे हैं ।
मुक्त व्यापार द्विअर्थी है। यह सही मायने में स्वतंत्र व्यापारियों के बीच सही कीमत पर स्वाधीनता से किये जाने वाले आदान प्रदान का अंत है ।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पश्चिम की देन नहीं जैसा कि अक्सर कहा जाता है । सच तो यह है कि सन 1600 में ईस्ट इन्डिया कंपनी का निर्माण भारत के व्यापार को हड़पने के लिये किया गया था क्योंकि भारत व्यापार का केंद्र था । कोलंबस ने इसी कारण से भारत आने की कोशिश की थी । ब्रिटिश शासन से पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था का 27 फीसदी हिस्सा भारत की अर्थव्यवस्था थी जबकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था मात्र 1.8 फीसदी थी । दो सौ साल के शासन में भारत को भूख और गरीबी का देश बना दिया गया है ।
जैसा कि शशि थरूर अपनी किताब `ऐन इरा ऑफ डार्कनेस' (अंधकारमय युग) में बताते हैं - "ब्रिटिश एक तरफ सदियों से भूमि और समुद्र के जरिये होते आए भारत के मुक्त व्यापार को खत्म कर रहे थे और दूसरी तरफ मुक्त व्यापार का गुण गा रहे थे । "

1716 में पहले वैश्विक निगम, ईस्ट इंडिया कंपनी ने फर्रूखसियर के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत किया जिसे फर्रुखसियर फर्मान का नाम दिया गया था । इस मुक्त व्यापार समझौते के जरिये ब्रिटिश ईस्ट इन्डिया कंपनी ने भारत को उपनिवेश बनाकर उसकी अर्थव्य्वस्था को अपने अधीन कर लिया । 1757 में पलासी के युद्ध के जरिये जिसमें रॉबर्ट क्लाइव नें चालाकी से मीर जाफर के साथ साँठ- गाँठ कर लिया था, ईस्ट इन्डिया कंपनी ने बंगाल पर कब्जा कर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की बजाय शासन करना शुरू कर दिया । आज के शासन करने वाले करोड़पतियों ने विश्व व्यापार संगठन (वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन या डबल्युटीओ) के मुक्त व्यापार के नियमों की सहायता से रॉयल्टी और टैक्स के रूप में करोड़ों -अरबो हड़प लिया है ।   
 
1994 में मार्राकेश, मोरोक्को में कई सरकारों ने मिलकर शुल्क और व्यापार के सामान्य समझौते पर हस्ताक्षर किये जिससे 1995 में विश्व व्यापार संगठन का निर्माण हुआ । फर्रुखसियर फर्मान की तरह ही विश्व व्यापार संगठन के समझौते निगमों द्वारा निगमों के लिये इस तरह लिखे गए हैं कि उसके जरिये संसाधनों, उत्पादन, बाजार और व्यापार पर उनकी पकड़ और मजबूत हो सके, उन्हें एकाधिकार मिल सके और आर्थिक व राजनीतिक लोकतंत्र नष्ट हो जाएँ । विश्व व्यापार संगठन और मुक्त व्यापार के समझौते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार - जो कि राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर होता है - उससे भी आगे जाते हैं । 

तथाकथित "मुक्त व्यापार" के समझौते हमारे दैनिक जीवन और हमारी स्वतंत्रता को भी नष्ट कर रहे हैं । उनके कारण किसानों की बीज संप्रभुता खतरे में है । उन्होंने बाजार को विषैले प्रसंस्कृत भोजन या जंक फूड से भर दिया है और प्राकृतिक बीजों को खत्म कर हानिकारक जीएम बीज लाने की पूरी कोशिश में लगे हैं जिसके कारण हमारी स्थानीय पारिस्थितिक कृषि और खाद्य प्रणाली नष्ट हो रही है । इस प्रकार वह हमारे लोकतंत्र का भी नाश कर रहे हैं और यही कारण है कि मैंने बीज स्वतंत्रता, भोजन स्वतंत्रता और पृथ्वी पर लोकतंत्र की स्थापना को अपने जीवन का ध्येय बना लिया है ।  
       
विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) का ट्रिप्स (टीआरआईपीएस) समझौता अमरीकी बायोटेक्नॉलजी कॉर्पोरेशन मोंसेन्टो ने लिखा है । उनकी कोशिश थी कि इसके जरिये बीजों को मोंसेन्टो का आविष्कार बताकर उन्हें पेटेन्ट किया जा सके और कंपनी की "बौद्धिक संपदा" बताकर उनसे बड़ा लाभ कमाया जा सके ।  हम देख चुके हैं किस प्रकार भारत में इन निगमों द्वारा इस कॉर्पोरेट परिभाषित नाजायज "संपत्ति" के जरिये जीएम बीजों के दाम बढ़ा दिये गए और उसका क्या परिणाम हुआ ।  तीन लाख किसानों की अत्महत्या संस्थागत नरसंहार का सबूत है । 

कारगिल ने विश्व व्यापार संगठन का कृषि समझौता लिखा था । परिणाम यह हुआ कि भारत जो तिलहनों और दालों का सबसे बड़ा उत्पादक था, अब सबसे बड़ा आयातक बन गया है । आयात किये जाने वाले खाद्य तेल हैं जीएम सोया और ताड़ का तेल । दोनो को ही हेक्सेन की सहायता से द्रावक निष्कर्षन के जरिये निकाला जाता है । दोनो ही अर्जेन्टीना, ब्राजील और और इन्डोनेशिया में बड़े पैमाने पर उगाए जा रहें हैं जिसकी वजह से वहाँ के जंगल तेजी से नष्ट हो रहे हैं । और हम कैनेडा और मोजांबीक से दाल आयात कर रहे हैं जिसके कारण हमारे किसान अपनी उपज को बेचने में असमर्थ हैं ।   

जंक फूड उद्योग, कोक और पेप्सी ने विश्व व्यापार संगठन का एसपीएस  समझौता लिखा । हमारे खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम को खत्म कर खाद्य सुरक्षा नियामक या एफएसएसएआई को प्रतिस्थापित किया गया | भारत की समृद्ध विविधता, लघु और कुटीर उद्योग आधारित खाद्य व्यापारों को इसके जरिये नष्ट किया जा रहा है । यहाँ तक कि वर्धा में गाँधीजी के घनी (स्वदेशी ठंड प्रेस तेल मिल) को भी एफएसएसएआई ने नोटिस दिया । प्रसंस्कृत और जंक फूड के बुरी सेहत से संबंध के बारे काफी जानकारी होने के बावजूद भी जंक फूड को सरकार से आर्थिक सहायता मिलती है जबकि हमारी स्वस्थ खाद्य प्रणाली को कानूनों के माध्यम से प्रतिबंधित किया जा रहा हैं, या वाशिंगटन से प्रेरित `नकदी पर युद्ध' अर्थात नोटबंदी द्वारा बंद किया जा रहा है ।

यह नव-उदारतावादी आर्थिक आदर्श कॉर्पोरेट अविनियमन के जरिये कोर्पोरेट शासन द्वारा एक बार फिर उपनिवेश स्थापित करने की कोशिश है (जैसा ईस्ट इन्डिया कंपनी के दिनों में था) जिसे नियंत्रण और धन निष्कर्षण के पुराने उपकरणों की सहायता से चलाया जा सके ।
जबकि ग्लोबलाईजेशन, नव उदारतावाद और मुक्त व्यापार `कम सरकारी खलल' की बात करते हैं सच तो यह है कि कोर्पोरेट वैश्वीकरण कोर्पोरेट निगरानी राज्य (सर्वेलेंस स्टेट) की स्थापना पर निर्भर होगा जहाँ आम जनता की सभी गतिविधियाँ निगरानी में होंगी और एक शक्तिशाली सैन्य पुलिस हमेशा तैनात रहेगी ताकि उनके एक प्रतिशत अमीर शासक सुरक्षित रहें । 

डीरेगुलशन जो वास्तव में सिर्फ निगमों को सुविधाएं देगा,उसका जनता के जीवन, आजीविका और स्वतंत्रता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा । निगम जैसे-जैसे आपस में जुड़कर अधिक शक्तिशाली बनेंगे लोगों की असली अर्थव्य्वस्था को खत्म करते जाएंगे । गहरे स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निगमों के द्वारा असली अर्थव्यवस्था पर  वित्तीय शक्ति हावी हो गयी और असली अर्थव्यवस्था को बनाये रखने वाले साधन उनके कब्जे में होते जा रहे हैं, साथ ही प्रकृति और पृथ्वी का शोषण बढ़ता जा रहा है । इसके साथ ही राजनीति में भी बदलाव आ रहा है, लोकतांत्रिक समाजों में लोगों की शक्ति कम और कॉर्पोरेशनों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है । अब वह "लोगों की, लोगों द्वारा, लोगों के लिए"  होने की बजाय "निगमों की, निगमों द्वारा, निगमों के लिए" होते जा रहे हैं । सबसे चिन्ता की बात यह है कि आर्थिक शक्ति का मुट्ठी भर अनिर्वाचित, अनुत्तरदायी व्यक्तियों के हाथों में होने का अर्थ है उनका हमारी राजनीति, कानून, नीतियों को प्रभावित करने की शक्ति और उनके द्वारा हमारे भोजन, स्वास्थ्य, साथ ही पृथ्वी के भविष्य पर अधिकार बन जाता है ।

भारत में नीति निर्माण की सर्वोच्च संस्था नीति आयोग जो कि शासनात्मक कार्य भी करती है ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जिनकी विशेषता सिर्फ कॉर्पोरेट "मुक्त व्यापार" और व्यापार उदारीकरण है । आयात की जरूरत न होने पर भी जबरन आयात प्रवर्तन, उन सरकारी संस्थाओं को अलोकतांत्रिक रूप से कमज़ोर बनाना जो संविधान के अनुसार किसानों के बीज पर अधिकार की और जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षित दवाओं के अधिकार की रक्षा करते हों, और जीएम बीज और खतरनाक दवाओं को बढ़ावा देना यह सब कोर्पोरेट जाल के लोगों के वास्तविक जीवन मे दखलंदाजी के उदाहरण हैं ।
नीति आयोग बाजार बन गया है जहाँ भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक कॉर्पोरेट लॉबी समूह निजी बाजार बनाने की कोशिश में लगे हैं । यह हमारे लोकतंत्र का प्रणालीगत भ्रष्टाचार है, लोगों की असली अर्थव्यवस्था के विनाश का नुस्खा है ।

आर्थिक शक्ति का चन्द अनुत्तरदायी लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था का विनाश बेरोजगारी, विस्थापन और आर्थिक असुरक्षा पैदा कर रहा है । शक्तिशाली लोग इस असुरक्षा की भावना को धर्म और जाति के आधार पर समाज को विभाजित करने के लिये इस्तेमाल करते हैं । समाज का इस प्रकार टुकड़ों में बँटकर विध्वंस हो जाना चंद लोगों के धन संचय के पराश्रयी तरीकों और उनके अंतहीन लोभ से जुड़ा है ।
राजनैतिक स्वतंत्रता की इस अवधि में हमें एक नये आंदोलन की जरूरत है । 2017 में गांधीजी के चम्पारन सत्याग्रह के अवसर पर यह हमारी राष्ट्रीय प्रतिज्ञा होनी चाहिये ।
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इस ब्लॉग में छपे लेख स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिये केवल शैक्षिक उद्देश्यों से उपलब्ध कराए गए हैं ।

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