Thursday, 8 December 2016

डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल अमीरों को पसन्द है, आम जनता के हित में नहीं - डा॰ वंदना शिवा

भारत में ३६ वाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला,प्रगति मैदान, दिल्ली में डिजिटल ईन्डिया पविलियन का एक दृश्य (चित्र पीटीआई)

भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डा॰वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है । 

http://www.asianage.com/opinion/columnists/301116/cash-is-pro-people-only-rich-love-digital.html 

लोगों की अर्थव्यवस्था की सबसे शुद्ध मुद्रा है जीवन, स्नेह, ऐक्य और विश्वास

जब से कॉर्पोरेशनों का जन्म हुआ - सामुहिक ईस्ट इन्डिया कंपनी उनका सबसे पहला रूप था - तब से कॉर्पोरेशनों के जरिये मानवजाति पर राज करने वालों ने पृथ्वी और इन्सानों से धन कमाने के नये नये तरीके निकाले हैं और दोनों को ही गरीब बनाते चले गये हैं ।
कंपनी राज के दौरान इस धन की निकासी लगान (जमीन और खेती पर कर या टैक्स ) द्वारा की जाती थी । अभिलेख बताते हैं कि 1765 और 1815 के बीच कंपनी ने भारत से प्रति वर्ष 18 मिलियन पाउन्ड (180 लाख रुपया) लूटा । उपज का 50 प्रतिशत लगान के रूप में लिया जाता था जिसके कारण बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था ।

कंपनी ने लोगों के टिकाऊ और दीर्घकालिक अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले  उत्पादन का 70 प्रतिशत ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रहता था । उसके बदले एकतरफा लूटनेवाली प्रणाली की स्थापना की गई जिससे भारत का ज्यादातर धन इंगलैन्ड को समृद्ध बनाने के लिये लूटा जाने लगा ।

आजकल इस कॉर्पोरेट साम्राज्य के धन लूटने के नये तरीकों में से दो मुख्य तरीके हैं- पेटेन्ट लेना (आविष्कार के नाम पर अनन्य अधिकार पाना) और पूंजीकरण । रसायनिक - बायोटेक - बीज उद्योग ने अब बीजों और जीवों पर वैज्ञानिक सुधार के बहाने पेटेन्ट लेने का तरीका इजाद किया है ताकि किसानों से धन कमा सके ।
दूसरा तरीका - पूंजीकरण -यानि अर्थव्यवस्था का फाईनैन्शिलाइज़ेशन या हर चीज की कीमत रुपयों में लगाना भी उतना ही खोटा है । इसके जरिये लोगों को बहुत कष्ट दिया जा रहा है, उनके द्वारा असली अर्थव्यवस्था में उत्पादित असली धन को तुच्छ करार कर सिर्फ पूंजीवादियों को पुरस्कृत किया जा रहा है । नक्ली नोटों की अर्थव्यवस्था अब असली अर्थव्यवस्था से 70 गुणा बड़ी हो गई है । 2008 में हुए वॉल स्ट्रीट क्रैश इसी भूमंडलीय जुआखाना के निर्माण का नतीजा था । उन दिनो भारत की अर्थव्यवस्था वास्तविक होने के कारण हम सुरक्षित थे । 

अब विश्व की धन सम्पत्ति पेटेन्ट, पूंजीकरण और डिजिटलीकरण के जरिये मात्र एक प्रतिशत लोगों के हाथों में केन्द्रित हो गई है | और भारतीय घरों में दाखिला पाने के लिये एक आखरी चाल चली जा रही है, वह है विमुद्रीकरण या नोटबंदी जो 8 नवम्बर को शुरू हुआ । 

एक करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत देश मे नोटबंदी की शुरुआत करने का मकसद है नागरिकों के धन पर कॉर्पोरेट साम्राज्य का अधिकार स्थापित करना, उनके धन को कूटलेखन कुंजी (एन्क्रिप्शन-की ) द्वारा जब्त कर रातोंरात जनता की अर्थव्यवस्था को बन्द कर देना, सिर्फ उन्हे छोड़कर जो डिजीटल अदायगी के द्वार पर खड़े द्वारपाल को त्तृप्त रखने मे सक्षम हैं । नैस्पर्स ग्रुप डिजिटल भारत का वह द्वारपाल है ।

भारत में 90 प्रतिशत से अधिक लोग नकद का इस्तेमाल करते हैं, यही जनता की अर्थव्यवस्था को बनाये रखता है  । नकद अपक्षपाती है, एक आदमी की कमाई के पैसे में उतना ही दम है जितना दूसरे की कमाई में । अबतक `एएमईएक्स ब्लैक' 1000 रुपये के नोट नहीं है । रातोंरात 86 प्रतिशत मुद्रा को अवैध बना दिया गया, जो कि बहुत की क्रूर है । एक चायवाले के पास जैसे जैसे छुट्टे पैसे जमा होते जाते हैं, वह उसे सौ रुपये, फिर पाँच सौ रुपये और फिर हजार रुपये में बदल लेता है क्योंकि किराया देने के पैसे ना होने के कारण घर नहीं है और घर का पता न होने के कारण उसका बैंक अकाउन्ट नहीं है । 8 नवम्बर 2016 की रात ठीक बारह बजे बिना घर बार का ये चायवाला जिसकी जिन्दगी उन बन्द किये गये नोटों से चलती थी, भारतीय अर्थव्यवस्था से गायब हो गया । एक नेस्कैफे की मशीन उसकी जगह ले लेगी ।

लोगों की अर्थव्यवस्थाओं में सबसे शुद्ध मुद्रा है जीवन, स्नेह, ऐक्य और विश्वास । इसी कारण से मानवता, खुशी, स्वास्थ्य आदि को जब मापदंड बनाया जाता है तो हम यह पाते हैं कि ज्यादातर सभ्य समाज वह हैं जो प्रतिदान या वस्तु-विनियम पर चलते हैं । जब नकद को प्रतिदान के लिये इस्तेमाल किया जाता है तो रूबरू लेन देन के जरिये भी समुदाय का निर्माण होता है चूँकि लोगों की अर्थव्यवस्था परस्पर निर्भरता पर आधारित है ।

जिस प्रकार बीजों पर पेटेन्ट लेना किसानों को अपराधी ठहराने का एक अवैध प्रयास था, ठीक उसी तरह विमुद्रीकरण लोगों की उस अर्थव्यवस्था को अपराधी ठहराने का अवैध प्रयास है जो कि भारत की अर्थव्यवस्था का 80 प्रतिशत हिस्सा है ।
यह बात स्पष्ट होती है बिल गेट्स के बयान से जो पेटेन्ट और डिजिटल अर्थव्यव्स्था के जरिये दुनिया के सबसे अमीर आदमी बन बैठे हैं ।

जैसा कि `नीति-भाषण शृंखला- भारत का परिवर्तन' लेक्चर सिरीज में अपने भाषण में उन्होंने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के समक्ष कहा " उच्च मूल्य के नोटों का विमुद्रीकरण और उनके बदले सुरक्षा सुविधाओं वाले नये नोट लाने का सरकार का निर्णय अस्पष्ट (धुन्धली) अर्थवयवस्था से अधिक पारदर्शी अर्थव्यवस्था की ओर एक महत्वपूर्ण व साहसिक कदम है । "

बिल गेट्स ने कहा कि डिजिटल लेन देन में जोरों से बढ़ोतरी होगी और अगले कई वर्षों में भारत न सिर्फ माप में बल्कि प्रतिशतता में भी सबसे अधिक डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से होगा ।

याने कि अमेरिका के `सिलिकोन वैली के डाकू ' ने यह घोषित किया कि भारत की स्वदेशी अर्थव्यवस्था जो उसके जीवंत समुदाय पर आधारित थी,`अस्पष्ट या काली' अर्थव्यवस्था है, चूँकि वह गेट्स के डिजिटल एकाधिकार से बाहर है । हम आपके साम्राज्य की छाया नहीं हैं बिल गेट्स । हम मेहनती,इमानदार लोग हैं जो अब भी एक दूसरे पर विश्वास और आपस में मिल-बाँटकर रहने की, आदान -प्रदान की क्षमता रखते हैं । हममें आज भी सृजनात्मकता है, समुदाय में रहने की योग्यता और संधारणीय अर्थव्यवस्था चलाने की शक्ति है । आपके अनुसार पारदर्शी अर्थव्यवस्था वह है जिसमें वित्तीय और डिजिटल दुनिया लोगों पर, उनके जीवन के हर पहलू पर, उनकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण रख सके ।

डिजिटलीकरण उस विश्वास भरे रिश्ते का अन्त है जिसमें लोगों का अपने स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक दूसरे से साक्षात्कार होता था । यह एक दूसरे के सामने मानवीय तौर पर पारदर्शी होने का अंत है । नोटबंदी वह तथाकथित वित्तीय पारदर्शिता नहीं है जिससे काला धन का अन्त होगा । सच तो यह है कि आप और माईक्रोसोफ्ट `काली' अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं । अमेरिकी सेनेट (मंत्रिसभा) के 2012 के रिपोर्ट के अनुसार माईक्रोसोफ्ट ने अपतटीय (ऑफशोर) सहायक कंपनियों के जरिये 4.5 अरब डॉलर टैक्स देने से बचाया, जो कि बिल और मेलिन्डा गेट्स फाउन्डेशन के वार्षिक अनुदान (3.6 अरब डॉलर) से ज्यादा है । आप हमें पारदर्शिता सिखाना चहते हैं ?

1857 में हमनें दुनिया पर राज करने वाले पहले कॉर्पोरेशन ईआई कंपनी को बाहर निकाला । 1947 में हमने अंग्रेजों को अपने देश से बाहर किया जिन्होंने दुनिया का 80 प्रतिशत हिस्सा अपने कब्जे में रखा था । आज जब स्वदेशी की सबसे ज्यादा जरूरत है, हममें अपनी आर्थिक स्वाधीनता, लोकतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा करने की इच्छा कहीं ज्यादा प्रबल है । हम लोगों के लिये, लोगों की लोगों द्वारा बनाई गई अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा करेंगे और उसे जिन्दा रखेंगे । 

(लेखिका डा॰ वंदना शिवा पर्यावरण कार्यकर्ता और नवधान्य संस्था की निदेशक हैं। http://www.navdanya.org/home )
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इस ब्लॉग में छपे लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों से स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिए उपलब्ध कराए गए हैं 

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