Monday, 26 September 2016

भारतीय कृषि संकट : मोंसेन्टो की गतिविधियाँ भारतीय कानून के तहत गैरकानूनी हैं - डा॰ कृष्ण वीर चौधरी



साक्षात्कर्ता - इन्द्र शेखर सिंह
thecitizen.in 
२ सितम्बर २०१६

डा॰ कृष्ण बीर चौधरी भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष हैं, साथ ही कई अन्य पदों के अलावा भारतीय राज्य फार्म निगम (भारत सरकार उपक्रम) और भारत गन्ना विकास परिषद (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार) के भूतपूर्व अध्यक्ष,राष्ट्रीय कृषि कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडेरेशन (एनएएफईडी) के भूतपूर्व निदेशक, लघु कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार) के संस्थापक सदस्य रह चुके हैं ।
डॉ चौधरी ने राष्ट्रीय बीज संघ (एनएसएआई) में भारतीय किसानों के पक्ष में मोन्सेन्टो, बायर, सिंजेन्टा जैसे बीज सप्लाई करने वाली संस्थाओं को चुनौती दी और उन्हें कृषि संकट के लिये दोषी ठहराया । उन्होंने यह मांग की कि यह संस्थाएं भारत के बीज कानून का सम्मान करें और भारतीय किसानों से रॉयल्टी के रूप में अवैध मुनाफा न कमाएँ ।
द सिटिजेन (टीसी) के इन्द्र शेखर सिंह डॉ चौधरी से मिले और उनसे हाल के घटनाक्रम के बारे बात-चीत की ।

टीसी -  मोंसेन्टो और बायर जैसी कंपनियाँ भारत के राष्ट्रीय बीज संघ से अलग क्यों हो गईं ?

डॉ चौधरी
- पहले हमें यह समझना चाहिये कि मोंसान्टो जैसी कंपनियों ने भारतीय किसानों से ५००० करोड़ रुपये रॉयल्टी के रूप में ले लिया है जो कि दरअसल गैरकानूनी है । उनके अधिक पैदावार, कीट नियंत्रण और किसानों के लिये अधिक आय के दावे  भी झूठे हैं । बॉलगार्ड १ और बॉलगार्ड २ व्यर्थ हो चुके हैं क्योंकि बॉलवर्म में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गयी है । २०१५ अक्तूबर में मोन्सेन्टो के बीटी कपास के झूठ और बायर के बेअसर कीटनाशक `ओबेरॉन ' के कारण पंजाब को ७०००० करोड़ रुपये के साथ २/३ बीटी कापास की हानि हुई । किसान को उत्पादक सामग्री पर ६ गुना ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है जबकि पैदावार में मात्र ३ प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है । बीटी कपास हर जगह विफल हुआ है ।

मीटिंग में रॉयल्टी के मुद्दे पर आपत्ति जाहिर करते हुए मैने कहा कि भारतीय संविधान (पौधा किस्म और कृषक अधिकार अधिनियम ) के अनुसार बीज और वनस्पति को पेटेन्ट करने की अनुमति नहीं है ।
मोंसान्टो द्वारा ली गयी रॉयल्टी भारतीय कानून के खिलाफ है । हम सरकार और कृषि संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary standing Committee on Agriculture) से यह मांग करते हैं कि बीज के दाम पर नियंत्रण लगाया जाय क्योंकि वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत जरूरी हैं । सरकर द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत बीटी कपास के बीज के दाम को विनियमित करने के फैसले का हम पूरा समर्थन करते हैं । साथ ही हमने सरकार से यह मांग भी की है कि बीज की कीमत पर नियंत्रण रखने के लिये एक नये प्राधिकरण विभाग का निर्माण हो ।
मैने सिर्फ यह कहा था कि एनएसएआई भारतीय कानून का समान करे और किसानों के हित में कार्य करे । लेकिन मोंसेन्टो, ड्यूपोन्ट पायनियर, सिन्जेन्टा और अन्य कंपनियों को यह बात आपत्तिजनक लगी । उन कंपनियों ने कुछ और कंपनियों के साथ एक तथाकथित `फेडेरेशन' की स्थापना की है । ये अंतर्रष्ट्रीय धोखेबाज भारत कि खाद्य सुरक्षा को अपने अधीन करना चाहते हैं । भारत की विशाल जनसंख्या को पर्याप्त भोजन मिले इसके लिये हमें बीज की जरूरत है, बीज पर नियंत्रण करके वह एक नये `बीज राज' की स्थापना करना चाहते हैं ।
मैंने न सिर्फ एनएसएआई को अवैध रॉयल्टी अस्वीकार करने की अपील की बल्कि यह भी कहा कि वह मोंसेन्टो से उनके विफल तकनीक के लिये मुआवजे की माँग करें जो बीटी कपास के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं और परिजनों को दिया जाए ।
मैंने जीएम सरसों की बात भी उठाई और कहा कि जीएम सरसों की प्रशंसा क्यों जब आरएच -७४९,रोहिनी, उर्वशी जैसी भारतीय नस्लें जीएम सरसों के २५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज की तुलना में ३० क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती हैं?
मैंने पैनल से अनुरोध किया है और मैं संसद में `श्वेत पेपर' निकलवाना चाहता हूं  ताकि भारत के लोग यह जान सकें कि कौन कौन से वैज्ञानिक, दफ्तरशाह,मीडिया के लोग और तथाकथित `किसान नेता' मोंसेन्टो की जेब में हैं । एक दशक से अधिक समय से मोंसेन्टो प्रभावशाली लोगों को अपने कुल वेतन भुगतान पर रखकर,उन्हें विदेश यात्रा के लिये पैसे इत्यादि देकर भारतीय कानून के हेर-फेर में लगा है । 
 https://youtu.be/kr6y6piId7A

टीसी - पहले फार्मा कंपनियाँ और अब बीज कंपनियाँ दूर विभाजित हो गईं, क्या यहाँ किसी तरह की प्रवृत्ति दिखाई देती है? और भारतीय किसानों पर इसका प्रभाव क्या होगा?

डॉ चौधरी - हाँ प्रवृत्ति है जिसके कारण बाजार में इन कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा । कैंसर, मधुमेह जैसी बीमारियों की दवाओं के दाम की तुलना कीजिये । वह नमक जिसे बनाने में सिर्फ पाँच रुपये खर्च हुए बाजार में इन कंपनियों द्वारा पचास रुपये में बेचा जाता है। भारत और अमेरिका में दिल की सर्जरी में इस्तेमाल किये जाने वाले `स्टेन्ट' को बनाने का खर्च और बिक्री कीमत की तुलना करे तो आपको उनके शोषण का अंदाजा हो जाएगा ।  
वह भारत की आम दवाओं पर भी पेटेन्ट उल्लंघन के नाम पर हमला कर रहे हैं । हमें विदेशी कंपनियों द्वारा भारत के गरीबों के स्वास्थ्य का शोषण स्वीकार नहीं है ।गरीबों को भी जीने का हक है और हर भारतीय को जरूरी दवाइयाँ  उचित दामों पर उपलब्ध होनी चाहिये ।
बीज कंपनियों ने दुनिया भर में एकाधिकार बनाया है और किसानों को धोखा दे रही हैं । भारत में हम यह होने नहीं दे सकते । पब्लिक सेक्टर को सरकार के साथ एक होकर भारतीय किसानों के बीज अधिकार और बीज प्रभुता की रक्षा करनी चाहिये ।
बीजों का अभिजनन, विनिमय और बिक्री भारतीय किसानों का मूल अधिकार है ।

टीसी -
एफएसआइआइ के संवाददाता सम्मेलन में ड्यूपॉन्ट पायनियर के कंट्री मैनेजर ने कहा ," उग्र लाईसेंसिंग नवीनीकरण दबा देता है । कोई भी निवेश करना नहीं चाहेगा । " क्या यह संभव है कि यह प्रधानमंत्री श्री मोदीजी के `मेक इन इन्डिया' स्कीम को चुनौती/धमकी हो, खासकर अब जब जॉन केरी भारत में हैं ?

डॉ चौधरी -- यह पूर्व नियोजित बातें बीज कॉर्पोरेशन इसलिये कह रही हैं क्योंकि जॉन केरी भारत आये हैं । वह भारतीय लोगों को गुमराह कर रही हैं चूंकि मामला लाईसेन्सिंग का नहीं बल्कि अवैध रॉयल्टी और भारतीय कानून को तोडने का है। भारतीय संविधान में बीज और वनस्पति को पटेंट करने की अनुमति नहीं है । वह भारत की सरकार पर व्यर्थ दबाव डाल रहे हैं ताकि सरकार मोंसेन्टो की अवैध माँगों के आगे झुक जाए । लेकिन मैं उन्हें यह याद दिलाना चाहूंगा कि भारत का पब्लिक सेक्टर अनुसंधान एवं विकास बहुत ही बड़ा है । उसके  विध्वंस होने का कारण है  जीएम का अधिप्रचार और सरकार का मोंसेन्टो जैसी कंपनियों द्वारा प्रहस्तन । आज अगर भारत दलहन और खाद्य तेलों का आयात कर रहा है तो इसलिये कि यह पिछली सरकार की नीति थी ।
जहाँ तक सवाल खतरे या चुनौती का है - हमें उनकी परवाह नहीं है क्योंकि भारत मजबूत चरित्र का देश है । हम मजबूत रहकर अपने लोगों और किसानों की हिफ़ाज़त करेंगे ।

टीसी  -- जहाँ भारत का एकाधिकार व्यापार विरोधी नियामक सीसीआई (कंपिटीशन कमीशन ऑफ इन्डिया)  "अनुचित व्यापार प्रणाली" के लिये माहिको-मोन्सेंटो की जाँच कर रहा है, वहीं एफएसआईआई ने बीज के दाम को बाजार शासित बनाने की माँग की है । इस "मुक्त व्यापार" या "बीज राज" का क्या करना चाहिये ?

डॉ चौधरी -- सबसे पहले मं यह स्पष्ट कर दूँ कि मोंसेन्टो ने पहले से ही अनुचित रूप से बाजार में एकाधिकार बना लिया है । ९५% बीटी कपास के बीज उसकी संपत्ति हैं और यह हाल लगभग एक दशक से है । अब तक मोंसेन्टो बिना किसी रोक टोक के बीज की विशिष्टता और रॉयल्टी फीस का निर्णय किया करता था जिसके कारण ३ लाख किसानों ने पिछले बीस वर्षों में आत्महत्या कर ली | अधिकतम किसान बीटी कपास उगाने वाले क्षेत्र से थे । मेरी राय में, बीज एक आवश्यक वस्तु है और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत विनियमित किया जाना चाहिए। भारतीय किसानो को मोनसेंटो के बाजार लाभ के लिए अपने पसीने और जान की भारी कीमत देनी पड़ी है । अब समय आ गया है कि सरकार मोनसेंटो के बीज राज को बंद करने के लिये कार्यवाही करे । हमने एनएसएआई और पार्लियामेन्ट से इस बात के लिये अनुरोध किया है , एनएसएआई हमारी बात से सहमत है और बीज एकाधिकार को समाप्त करने के लिये कार्यवाही कर  रही है ।
                                                             https://youtu.be/vBI_F5r6JKo

टीसी -- भारत में बीज का भविष्य क्या है?

डॉ चौधरी -- हमारा अनुसंधान एवं विकास फिर से चल पड़ा है और देशी किस्मों में सुधार लाने के लिये दक्षतापूर्वक काम होना चाहिये । सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड और सिंचाई योजनाओं से भी कृषि उत्पादकता बढ़ेगी । साथ ही भारत में प्राकृतिक खेती को जोर शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है । दरअसल ऑर्गैनिक हिमालय योजना की घोषणा हो चुकी है ।
साथ ही सरकार द्वारा एक लाख गाँवों को रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में परिवर्तित करने की योजना है चूँकि रासायनिक खेती से छोटे खेतों को नष्ट कर दिया है ।
हम अमेरिका जैसे देशों में प्रचलित रसायनिक खेती के तरीके को नहीं अपना सकते क्योंकि हमारे देश में ८५% किसान के पास २ एकड़ से कम जमीन है । अमेरिका के बड़े खेतों के बनने का मतलब है लाखों करोड़ों किसनों की बेरोजगारी और मौत , यह हमें मंजूर नहीं ।
साथ ही भारत अमेरिका की तरह रसायनिक खेती करने वाले किसानों को बड़ी सब्सिडी नहीं दे सकता , यहाँ अमेरिका की तरह बड़ा फार्म बिल यहाँ नहीं हो सकता ।
हम भारतवासियों को अपने देश की स्थिति को समझना चाहिये, बीज और खाद्य  संप्रभुता के लिये हर प्रयास करना चाहिये और आँखें मूंदकर रसायनिक खेती द्वारा पदोन्नत किये अवैज्ञानिक और विफल प्रौद्योगिकियों को अपनाना नहीं चाहिये ।
=========================

इस ब्लॉग में छपे लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों से स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिए उपलब्ध कराए गए हैं |

No comments:

Post a Comment

A look at the Rohingya Crisis

American plan for a South Asian “Kosovo” in Rohingyaland Andrew KORYBKO   09/06/2015  Oriental Review Part I   As complex ...