Wednesday, 31 August 2016

जीएम बीज, कृषि उत्पादकता और राजनीतिक छल - उत्तम भारतीय सनातन खेती को खत्म करने का प्रयास

http://hindi.krishibhoomi.in/Haryana.aspx
ऐतिहासिक तौर पर भारत के किसानों ने दुनिया को यह साबित कर दिखाया था कि चाहे अनाज की जरूरत जितनी भी हो, सब कुछ जैविक और टिकाऊ खेती द्वारा उपजाया जा सकता है और यह काम अनंत काल तक किया जा सकता है । कुदरती खेती करने वाले किसान न सिर्फ हमारा बल्कि धरती की सेहत का भी खयाल रखते हैं । वह पूरे विश्व के अन्नदाता हैं | दुनिया की भूख और भुखमरी का हल उन्हीं के हाथों में है ।
(श्री अरुण श्रीवास्तव ने यह लेख २०१३ में लिखा था जिसे आप अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं --

http://jaagatiduniya.blogspot.co.uk/2016/08/india-genetically-modified-seeds.html )

मनमोहन सिंह और शरद पवार ने जी-एम (जेनेटकली माडिफाइड अर्थात् आनुवांशिक रूप से संशोधित) बीजों पर आधारित जीन क्रांति के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि के दोषपूर्ण वैज्ञानिक कल्पना को आगे बढ़ाया है । मोन्सांटो की मनगढ़ंत कहानियों पर उन्हें अटल विश्वास है । दोनों को ही कृषि विज्ञान और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन पढ़ने की जरूरत है मगर समस्या यह है कि वह यह समझ नहीं सकते हैं ।
कुछ उल्लेखनीय अपवादों को छोड़कर ज्यादातर कृ्षि वैज्ञानिक भी नीम हकीमों के जादू के वश में हैं और यह समझते हैं कि हमारे किसान आदिम और अवैज्ञानिक हैं इसलिये उन्हें  `आधुनिक तकनीक’ अपनाना चाहिये ।

असफल हरित क्रांति को जबरन आगे बढ़ाने वाले धोखेबाज अब विफल जीन क्रांति के तकनीकी छल को आगे बढ़ा रहे हैं । वह उन सभी साक्ष्य आधारित विज्ञान को अस्वीकार करते हैं जो नई मनगढ़ंत कहानियों पर टिके उनके अंधे विश्वास को कमजोर करता है । मोन्सांटो के तथाकथित सफलता के पुजारी इन लोगों ने उन जातीय सफाया  (यूजेनिक्स) का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों, सार्वभौमिक रसायन, अन्न और बीज उत्पादकों के सामने मस्तक झुकाना पसंद किया है जिन्होंने अन्न को मानव जाति की पीड़ा और संहार का हथियार बना दिया है । भारतीय पारंपरिक कृषि की निष्पक्ष समीक्षा किये बिना यह लोग भूतपूर्व उपनिवेशवादियों की तरह भारतीय किसानों को बदनाम करते रहते हैं । अगर भारतीय खेती प्रथा वास्तव में `सदियों से गतिहीन’ है और भूख, अपर्याप्त पोषण और गरीबी का कारण थी तो इन वैज्ञानिकों के पूर्वज खत्म हो गये होते ।

ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ और आज के हालात
भारत में ऋग्वेद के दिनों [ ८००० ई.पू से ६००० ई.पू] से अर्थशास्त्र [लगभग ३२० ई.पू] और मध्ययुगीन अवधि के दौरान की कृषि प्रबंधन पर हजारों पाण्डुलिपियाँ हैं मगर अंग्रेज उपनिवेशवादियों ने भूमि प्रबंधन प्रथाओं को समझे बिना बददिमाग वैज्ञानिकों की कहानियों पर ज्यादा भरोसा किया । ब्रिटेन ने अपने भोजन-के-लिये-अन्तहीन-युद्ध की अनंत क्षुधा को तृप्त करर्ने के लिये भारत को सदियों लूटा । नकद के लिये सर्वश्रेष्ठ खेतों में खाद्य फसलों को नष्ट कर अफीम और नील की खेती कराई गयी । कई दशकों तक अनुसंधान और क्षेत्र परीक्षण के बाद ( जिसकी शुरुआत १९०५ में हुई थी) , सर ऐल्बर्ट हावर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय किसान कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे, उनका किया मिट्टी की उर्वरता का प्रबंधन दरअसल बेहतर था । उनका जैविक विधि का समर्थन नये तकनीकों का भय नहीं बल्कि पश्चिम देशों में हो रहे उपज लाभ के बावजूद अजैविक रासायनिक खेती के खिलाफ विज्ञान आधारित विरोध था ।
तालिका १ – १८९० में गेहूँ खेती के मुख्य क्षेत्रों में औसत उपज
देश
भारत
ब्रिटेन
फ्रांस
जर्मनी
रूस
कैनडा
अमेरिका
औस्ट्रेलिया
किलो प्रति हेक्टयर
६४८
१८१४.४
११०१.६
११६६.४
५८३.२
९०७.२
८१०
७१२.८
यूरोप के मुख्य गेहूँ खेती के इलाकों की उपज मध्य उत्तर प्रदेश और गंगा क्षेत्र से कहीं कम थी । १८९० में भारतीय किसान रासायनिक खेती के बिना ब्रिटेन की उपज से दुगुना धान उगा रहे थे और औसत उपज ५६ बुशेल (बुशेल -३२ सेर का तौल) प्रति हेक्टेयर थी । सभी पश्चिमी देशों में भारत के सर्वोतम खेती की उपज के मुकाबले आधे से भी कम उपज होती थी  । जैसा कि १७६०-६४ के ब्रिटिश रिकार्ड्स बताते हैं चेंगलपट्टू इलाके के गांवों मे चावल की पैदावार १२ लाख टन प्रति हेक्टेयर थी ।  क्या यह कृषि वैज्ञानिकों का प्राथमिक काम नहीं था कि १७६० के खेती के अभिलेखों का अद्ययन करें और हजारों साले की मेहनत से हासिल किये इन बेहतरीन तरीकों को अपनायें, जिनके बारे सर हावर्ड ने लिखा कि `महासागरों और अमेरिका के प्रेयरी चारागाह की तरह प्राकृतिक और मौलिक था ? ‘

Sunday, 21 August 2016

India: Genetically Modified Seeds, Agricultural Productivity and Political Fraud


 
March 24, 2013

The world doesn’t need “modern technology” of poisonous pesticides, destructive fertilizers and patented GE seeds that can’t match 1890 or even 1760 AD yields in India. Modern technology has actually destroyed the nutrition in common foods.

Manmohan Singh and Sharad Pawar have been advancing their pseudo-scientific vision of productivity growth through the Gene revolution based on Genetically Engineered [GE] seeds. Their faith in Monsanto scripted New Gospel is akin to that of any religious fundamentalist. Both need tutoring in Agronomy and Supply Chain Management .
Few notable exceptions aside, majority of agricultural scientists under the spell of Mankombu Sambasivan Swaminathan also believe that our farmers are unscientific, primitive and must adopt “modern technology.”
Those who pushed the failed Green Revolution are now advancing the failed Gene Revolution techno-fix. They reject any evidence based science that undermines their faith in the New Gospel. High on Monsanto opiate, they have chosen to ritually genuflect to the eugenicists, the Global Chemical, Food and Seed Cartel who have weaponized food. Without objective appraisal of traditional Indian agriculture they continue to discredit Indian farmers like the old colonialists did. If Indian farm practices had “stagnated for centuries” and caused hunger, malnutrition and poverty the ancestors of these scientists would be dead.
Historical trends and the state of affairs now
Although India has thousands of manuscripts on agriculture management from the times of Rig Ved [8000 BC to 6000 BC] to Arthshastra [Around 320 BC] and throughout the medieval period, the British colonialists relied more on anecdotes of roving pseudo-scientists without truly understanding soil management practices.  Britain’s insatiable food-for-endless-wars appetite necessitated stealing surplus from India; for cash the best lands were diverted to opium and indigo. After decades of research and field trials starting 1905, Sir Albert Howard concluded that there was nothing wrong with India’s farmers and that organic fertility management was superior. His endorsement of organic method wasn’t Luddite romanticism but science based refutation of inorganic chemical based fertility management despite yield gains in the West, given in Table 1.

Sunday, 14 August 2016

Does the Sky Look Unnatural Where You Live ? Have You Ever Wondered Why?


Bringing the critical issue of global climate engineering to light and to a halt is the great imperative of our time. In order to have any reasonable chance of succeeding in this all important battle, all of us are needed to join the fight. Each of us can gain ground every single day in this effort by spreading and sharing credible introductory information with individuals, organizations, and media, that would care if they only knew of the issue and had a dose of solid data to go on. The introduction article below was drafted for the use of the public relations firm which is helping us with media exposure for the Geoengineering Watch Legal Team. This letter can be used by anyone to help with the effort to start "spot fires" of awareness everywhere possible. The more such an introduction to geoengineering is forwarded groups, organizations, media, and individuals (that, again, would care if they knew of the issue), the sooner we will reach a critical mass of awareness. If we all combine our efforts in this battle, we can yet make a profound difference even at this late hour.

An Introduction To Geoengineering/Solar Radiation Management

As President Obama publicly rallies world leaders to move forward with a global response to climate change, a less discussed, but ongoing effort has long since been underway to attempt the management of solar radiation through the spraying of light scattering aerosols into the atmosphere and the direct manipulation of weather patterns — a process otherwise known as “geoengineering.”

Saturday, 6 August 2016

Monsanto Transgenic Pipeline is a Treadmill

http://2.bp.blogspot.com/-p9nvys5NLfo/T6i6H_O2CMI/AAAAAAAABdA/4M6yUfnbP6s/s1600/17870.gif

One of the most widely circulated of all the criticisms of the Green Revolution is backed by decades of research. This research demonstrates that "improved" hybrids require a high input regime that places the farmer on the "fertilizer and pesticide treadmill." 

Once the "modernizing" farmer gets on the agro-industrial chemical treadmill, the entire agroecosystem begins to behave like a drug addict. Eventually, the effectiveness of this chemical addiction unravels and the entire land organism falls apart in frenzied bouts of entropy. 

Have you ever seen a field that was abandoned to blowing winds, rocks,  sand, and weeds after four decades of monoculture chemical farming? It looks like a desert: Worst, since deserts have bountiful life in their nooks and crannies. The wasted fields of the Green Revolution that I have seen are barren stretches of lifeless Earth marked by salt leach piles and exposed plow pans.

मुक्त व्यापार - कॉर्पोरेट धोखेबाजी के लिए एक नेक चेहरा

भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच...