Friday, 29 July 2016

किसान और खेती की आउटसोर्सिंग से किसका भला होगा?


 pic: http://news.bbc.co.uk/1/hi/programmes/hardtalk/5033986.stm

कृषि प्रधान भारत की विडंबना यह है कि एक के बाद एक सरकारों की नीतियों, लागत व मूल्‍य नीति की खामियों और घटती जोत के आकार के चलते किसान और समूचा कृषि क्षेत्र मुश्किल में उलझा हुआ है।
इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले 20 साल के दौरान हर रोज औसतन 2035 किसान मुख्‍य खेतीहर का दर्जा खो रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि सभी सरकारें महंगाई पर काबू करने के नाम पर किसानों को उनकी उपज का पूरा दाम देने से बचती रही हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। किसान की बदकिस्‍मती देखिए कि वह हर चीज फुटकर में खरीदता है, थोक में बेचता है और दोनों तरफ का भाड़ा भी खुद ही उठाता है।

एनएसएसओ के 70वें राउंड के आंकड़े बताते हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कृषक परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 6426 रुपये है। इस औसत आमदनी में खेती से प्राप्‍त आय का हिस्‍सा महज 47.9 फीसदी है जबकि 11.9 फीसदी आय मवेशियों से, 32.2 फीसदी मजदूरी या वेतन से और 8 फीसदी आय गैर-कृषि कार्यों से होती है।
बढ़ती लागत के चलते किसान का मुनाफ लगातार घटता जा रहा है। वर्ष 2015 में पंजाब के कृषि विभाग ने बढ़ती लागत के मद्देनजर गेहूं का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 1950 रुपये प्रति कुंतल तय करने की सिफारिश की थी। खुद पंजाब के मुख्‍यमंत्री ने कृषि लागत एवं मूल्‍य आयोग यानी सीएसीपी और केंद्र सरकार से गेहूं का एमएसपी 1950 रुपये करने की मांग की थी। लेकिन नतीजा क्‍या हुआ? गेहूं का एमएसपी महज 1525 रुपये तय किया गया। अब बताईये 425 रुपये प्रति कुंतल का नुकसान किसान कैसे उठाएगा?

We Need To Move Beyond Agriculture Shaped By War Industry - Dr Vandana Shiva


GMO and Toxic Chemicals: Monsanto Is “Feeding the World”

मुक्त व्यापार - कॉर्पोरेट धोखेबाजी के लिए एक नेक चेहरा

भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच...