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Sunday, 12 March 2017

मुक्त व्यापार - कॉर्पोरेट धोखेबाजी के लिए एक नेक चेहरा



भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की |उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है |

 Click here to read original article in english.
 
प्रसंस्कृत, अस्वास्थ्यकर खाद्य (जंक फूड) और रोग के बीच के गहरे रिश्ते के बारे ठोस जानकारी होने के बावजूद भी जंक फूड उद्योग को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी जा रही है जबकि हमारे स्वस्थ खाद्य प्रणाली को कानूनों की सहायता से , या वाशिंगटन से प्रेरित "नकदी पर युद्ध" या नोटबंदी द्वारा प्रतिबंधित किया जा रहा है ।
"स्वतंत्रता" - यह शब्द अब इतना विवादास्पद बन गया है। जब हमलोग जनता के रूप में स्वतंत्रता शब्द का उपयोग करते हैं तो उसका मतलब होता है लोगों के लिए आजीविका कमाने की स्वतंत्रता, ताकि भोजन, पानी, बीज, भूमि, स्वास्थ्य, शिक्षा, ज्ञान, काम, रचनात्मकता, संचार, आदि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों का उपयोग संभव हो सके जो हमारी जिन्दगी के लिये जरूरी हैं ।
लेकिन बड़े कोर्पोरेशनों ने `स्वतंत्रता' को "मुक्त व्यापार" मान लिया है जो दरअसल कॉर्पोरेट वैश्वीकरण है , जिसके जरिये बड़े निगम और उनके नकाबपोश मालिक स्वतंत्रता के नाम पर हमारी पृथ्वी का शोषण कर रहे हैं, उसे नष्ट कर रहे हैं ।

Friday, 10 March 2017

Climate Engineering, Cooling Wealthy Nations While Poorer Countries Incinerate


Dane Wigington
GeoengineeringWatch.org

How is it possible that the abrupt climate shift unfolding on our planet is not creating nearly as much heat in wealthy nations as compared to poor countries? This, now statistically proven scenario, is yet another glaring red flag to confirm the ongoing global climate engineering insanity being carried out by militarized / industrialized nations. Highly toxic and environmentally devastating global geoengineering programs are a primary tool and weapon of the more powerful nations. The worldwide weather modification assault has been used to confuse and divide populations in regard to the true state of the climate and the true extent of the threat that we collectively face. The ongoing effort by the climate engineers to mask the full degree of climate damage from first world populations has been aggressive and consistent. 

  Geoengineered skies, Šiauliai, Lithuania. Photo credit: Zenonas Mockus
Recent studies have now proven that a completely unnatural global temperature scenario is taking place which would not be possible without the existence of ongoing climate intervention programs. Temperatures in high income nations are rising at a far slower rate than low income nations
Based on an average of three data reanalyses, the researchers found the percentage of hot days each year in low-income countries rose from a base of 10 per cent – or 37 days – during the 1961-90 base period to 22 per cent – or 80 days – by 2010.By contrast, rich nations had the percentage of hot days rise much slower, from 10 per cent to 15 per cent, or 37 to 55 days.

Monday, 23 January 2017

डिजिटल तानाशाही से सावधान

"नकदी प्रतिबंध" के माध्यम से डिजिटल अर्थव्यवस्था जबरन लागू करना दुनिया के अरबपतियों द्वारा तकनीकी तानाशाही का एक रूप है
भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की |उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है |
Click here to read original article in english.

2017 की शुरुवात के साथ हमारे लिये यह जरूरी हो गया है कि पूरे भारतवर्ष में रातों रात डिजिटल अर्थव्यवस्था लाने की होड़ में हम भारतवासी गिरते -पड़ते जो जिन्दगी जी रहे हैं, उससे कुछ पल के लिये थमकर यह सोंचें कि यह डिजिटल इकॉनॉमी क्या है, किसके नियंत्रण में है ,पश्चिम द्वारा पेटेन्ट किये गये मगर खुद पश्चिम देशों के लोगों के लिये भी हानिकारक सिद्ध हो रहे इस मुद्रा प्रणाली और टेक्नॉलजी के बुनियादी सिद्धान्तों को समझें जो हमारी जिन्दगी और स्वतन्त्रता को एक खास रूप और दिशा में ले जा रही हैं । हमारे विशाल देश और विविधता से परिपूर्ण उसकी प्राचीन सभ्यता को ये अप्रचलित सिस्टम अपने संकीर्ण सांचे में ढालकर हमारे काम करने के तरीकों को, हमारे जीवन की असंख्य खुशियों को संकुचित कर रहा है ।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब सट्टेबाज और बिना मेहनत किये किराया वसूलने वाले करोड़पति बन बैठे हैं । इसी बीच स्वयं-संगठित अर्थव्यवस्थाओं में ( जिन्हें असंगठित और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का गलत नाम दिया गया है) कड़ी मेहनत करने वाले लोग जैसे किसान और अन्य श्रमिक मजदूर जो पहले से ही गरीब थे उन्हें न सिर्फ और अधिक गरीबी में धकेल दिया जा रहा है  बल्कि उनकी स्वयं संगठित आर्थिक प्रणाली को `काला' कहकर उन्हें अपराधी घोषित किया जा रहा है ।

Thursday, 8 December 2016

डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल अमीरों को पसन्द है, आम जनता के हित में नहीं - डा॰ वंदना शिवा

भारत में ३६ वाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला,प्रगति मैदान, दिल्ली में डिजिटल ईन्डिया पविलियन का एक दृश्य (चित्र पीटीआई)

भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डा॰वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है । 

http://www.asianage.com/opinion/columnists/301116/cash-is-pro-people-only-rich-love-digital.html 

लोगों की अर्थव्यवस्था की सबसे शुद्ध मुद्रा है जीवन, स्नेह, ऐक्य और विश्वास

जब से कॉर्पोरेशनों का जन्म हुआ - सामुहिक ईस्ट इन्डिया कंपनी उनका सबसे पहला रूप था - तब से कॉर्पोरेशनों के जरिये मानवजाति पर राज करने वालों ने पृथ्वी और इन्सानों से धन कमाने के नये नये तरीके निकाले हैं और दोनों को ही गरीब बनाते चले गये हैं ।

कंपनी राज के दौरान इस धन की निकासी लगान (जमीन और खेती पर कर या टैक्स ) द्वारा की जाती थी । अभिलेख बताते हैं कि 1765 और 1815 के बीच कंपनी ने भारत से प्रति वर्ष 18 मिलियन पाउन्ड (180 लाख रुपया) लूटा । उपज का 50 प्रतिशत लगान के रूप में लिया जाता था जिसके कारण बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था ।

कंपनी ने लोगों के टिकाऊ और दीर्घकालिक अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले  उत्पादन का 70 प्रतिशत ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रहता था । उसके बदले एकतरफा लूटनेवाली प्रणाली की स्थापना की गई जिससे भारत का ज्यादातर धन इंगलैन्ड को समृद्ध बनाने के लिये लूटा जाने लगा ।

आजकल इस कॉर्पोरेट साम्राज्य के धन लूटने के नये तरीकों में से दो मुख्य तरीके हैं- पेटेन्ट लेना (आविष्कार के नाम पर अनन्य अधिकार पाना) और पूंजीकरण । रसायनिक - बायोटेक - बीज उद्योग ने अब बीजों और जीवों पर वैज्ञानिक सुधार के बहाने पेटेन्ट लेने का तरीका इजाद किया है ताकि किसानों से धन कमा सके ।

Thursday, 1 December 2016

पूंजीवाद


तड़प रही है धरती गुलामी की जंजीरों मे 
कट रहीं हैं धमनियाँ, तन घायल
हो रहे हैं जैसे उसपर वार लगातार
खौफ कुछ इस कदर बढने लगा है  ...
स्वच्छंद हवा भी छुप-छुप कर बहने लगी है
कि कैद न कर डालें उसे भी कहीं
जैसे बंदी बना डाला निर्बाध जल को बोतलों में
और उपादानों को देकर बिकाऊ वस्तुओं का आकार
कुछ इस तरह बेचते हैं भरे बाजार
मानो हो गुलामों का व्यापार |

Saturday, 29 October 2016

भारत - थाली में ज़हर - जीएम (जीन परिवर्तित) अन्न GM Foods in India



https://youtu.be/9Qk9leT5kzY
थाली में ज़हर - जीएम (जीन परिवर्तित) अन्न Genetically modified foods

 फिल्म निर्माता महेश भट्ट और अजय कंचन द्वारा बनायी गयी यह फिल्म जीएम अन्न के उन खतरों के बारे बताती है जो जीएम बीज बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने लोगों से छुपा रखा हैं । जीएम भारत में विदेश से आये स्नैक्स और अन्य संसाधित खाद्यों मे मिलाकर अवैध रूप से बेचे जा रहे हैं ।  ब्लड प्रेशर, डाईबीटीज़ (मधुमेह), कैंसर, दिल, गुर्दा और जिगर की बीमारी, साथ ही विभिन्न प्रकार की एलर्जियों की लगातार बढ़ती संख्या का हमारे खान-पान से गहरा संबन्ध है । इन बीमारियों के उपचार के लिये फार्मा कंपनियाँ लगातार नयी दवाइयाँ बनाती है जो लोगों के उपचार से अधिक फार्मा कंपनियों की जेबें भरने के काम आती हैं । यानि कि एक तरफ जहरीले खाद्य पदार्थों के जरिये बीमारियाँ पैदा की जा रही हैं और दूसरी तरफ उनके उपचार के लिये दवाइयाँ बेची जा रही हैं । बहुराष्ट्रीय कँपनियाँ दोनो से लाखों करोड़ों का मुनाफा कमा रही हैं ।
इस वक्त भारत में जीएम सरसों लाने की कोशिश जोर शोर से चल रही है जिसका लोग बड़ी संख्या में विरोध कर रहे हैं । इसे रोकने का एक ही तरीका है- हम सभी जीएम के खतरों को जाने, औरों को जानकारी दें और एक होकर इसका विरोध करें ।

अधिक जानकारी के लिये पढ़ें -

भ्रष्टाचार के बीज - भारत में खतरनाक अनावश्यक जीएम सरसों का प्रवेश 
जीएम बीज, कृषि उत्पादकता और राजनीतिक छल 
भारतीय कृषि संकट : मोंसेन्टो की गतिविधियाँ भारतीय कानून के तहत गैरकानूनी हैं
किसान और खेती की आउटसोर्सिंग से किसका भला होगा?  
मोन्सेन्टो की भयावह योजना - भारतीय किसानों का नियोजित खात्मा 

Thursday, 20 October 2016

Cell Phones, Brain Cancer and Public Health




Dr. Moskowitz is the Director of the Center for Family and Community Health, U.C. Berkeley School of Public Health. Dr. Moskowtiz reveals a new perspective on the research linking cell phones to an increased risk of brain cancer. In addition he reviews current research linking wireless EMF to a variety of illnesses and implications for public health.
Read more here - 
https://youtu.be/pr9Z0WeGtDk?list=PLf41Jom1MpoZu_JqaQHOSDzr2ymamWY8m 

Articles on this site have been made available for educational purposes only to advance the understanding of  health, social, economic, scientific, environmental and political issues.

Monday, 26 September 2016

भारतीय कृषि संकट : मोंसेन्टो की गतिविधियाँ भारतीय कानून के तहत गैरकानूनी हैं - डा॰ कृष्ण वीर चौधरी



साक्षात्कर्ता - इन्द्र शेखर सिंह
thecitizen.in 
२ सितम्बर २०१६

डा॰ कृष्ण बीर चौधरी भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष हैं, साथ ही कई अन्य पदों के अलावा भारतीय राज्य फार्म निगम (भारत सरकार उपक्रम) और भारत गन्ना विकास परिषद (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार) के भूतपूर्व अध्यक्ष,राष्ट्रीय कृषि कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडेरेशन (एनएएफईडी) के भूतपूर्व निदेशक, लघु कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार) के संस्थापक सदस्य रह चुके हैं ।
डॉ चौधरी ने राष्ट्रीय बीज संघ (एनएसएआई) में भारतीय किसानों के पक्ष में मोन्सेन्टो, बायर, सिंजेन्टा जैसे बीज सप्लाई करने वाली संस्थाओं को चुनौती दी और उन्हें कृषि संकट के लिये दोषी ठहराया । उन्होंने यह मांग की कि यह संस्थाएं भारत के बीज कानून का सम्मान करें और भारतीय किसानों से रॉयल्टी के रूप में अवैध मुनाफा न कमाएँ ।
द सिटिजेन (टीसी) के इन्द्र शेखर सिंह डॉ चौधरी से मिले और उनसे हाल के घटनाक्रम के बारे बात-चीत की ।

टीसी -  मोंसेन्टो और बायर जैसी कंपनियाँ भारत के राष्ट्रीय बीज संघ से अलग क्यों हो गईं ?

डॉ चौधरी
- पहले हमें यह समझना चाहिये कि मोंसान्टो जैसी कंपनियों ने भारतीय किसानों से ५००० करोड़ रुपये रॉयल्टी के रूप में ले लिया है जो कि दरअसल गैरकानूनी है । उनके अधिक पैदावार, कीट नियंत्रण और किसानों के लिये अधिक आय के दावे  भी झूठे हैं । बॉलगार्ड १ और बॉलगार्ड २ व्यर्थ हो चुके हैं क्योंकि बॉलवर्म में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गयी है । २०१५ अक्तूबर में मोन्सेन्टो के बीटी कपास के झूठ और बायर के बेअसर कीटनाशक `ओबेरॉन ' के कारण पंजाब को ७०००० करोड़ रुपये के साथ २/३ बीटी कापास की हानि हुई । किसान को उत्पादक सामग्री पर ६ गुना ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है जबकि पैदावार में मात्र ३ प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है । बीटी कपास हर जगह विफल हुआ है ।

मीटिंग में रॉयल्टी के मुद्दे पर आपत्ति जाहिर करते हुए मैने कहा कि भारतीय संविधान (पौधा किस्म और कृषक अधिकार अधिनियम ) के अनुसार बीज और वनस्पति को पेटेन्ट करने की अनुमति नहीं है ।
मोंसान्टो द्वारा ली गयी रॉयल्टी भारतीय कानून के खिलाफ है । हम सरकार और कृषि संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary standing Committee on Agriculture) से यह मांग करते हैं कि बीज के दाम पर नियंत्रण लगाया जाय क्योंकि वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत जरूरी हैं । सरकर द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत बीटी कपास के बीज के दाम को विनियमित करने के फैसले का हम पूरा समर्थन करते हैं । साथ ही हमने सरकार से यह मांग भी की है कि बीज की कीमत पर नियंत्रण रखने के लिये एक नये प्राधिकरण विभाग का निर्माण हो ।
मैने सिर्फ यह कहा था कि एनएसएआई भारतीय कानून का समान करे और किसानों के हित में कार्य करे । लेकिन मोंसेन्टो, ड्यूपोन्ट पायनियर, सिन्जेन्टा और अन्य कंपनियों को यह बात आपत्तिजनक लगी । उन कंपनियों ने कुछ और कंपनियों के साथ एक तथाकथित `फेडेरेशन' की स्थापना की है । ये अंतर्रष्ट्रीय धोखेबाज भारत कि खाद्य सुरक्षा को अपने अधीन करना चाहते हैं । भारत की विशाल जनसंख्या को पर्याप्त भोजन मिले इसके लिये हमें बीज की जरूरत है, बीज पर नियंत्रण करके वह एक नये `बीज राज' की स्थापना करना चाहते हैं ।
मैंने न सिर्फ एनएसएआई को अवैध रॉयल्टी अस्वीकार करने की अपील की बल्कि यह भी कहा कि वह मोंसेन्टो से उनके विफल तकनीक के लिये मुआवजे की माँग करें जो बीटी कपास के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं और परिजनों को दिया जाए ।
मैंने जीएम सरसों की बात भी उठाई और कहा कि जीएम सरसों की प्रशंसा क्यों जब आरएच -७४९,रोहिनी, उर्वशी जैसी भारतीय नस्लें जीएम सरसों के २५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज की तुलना में ३० क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती हैं?
मैंने पैनल से अनुरोध किया है और मैं संसद में `श्वेत पेपर' निकलवाना चाहता हूं  ताकि भारत के लोग यह जान सकें कि कौन कौन से वैज्ञानिक, दफ्तरशाह,मीडिया के लोग और तथाकथित `किसान नेता' मोंसेन्टो की जेब में हैं । एक दशक से अधिक समय से मोंसेन्टो प्रभावशाली लोगों को अपने कुल वेतन भुगतान पर रखकर,उन्हें विदेश यात्रा के लिये पैसे इत्यादि देकर भारतीय कानून के हेर-फेर में लगा है । 
 https://youtu.be/kr6y6piId7A

Sunday, 4 September 2016

Zika: A Masterpiece of Public Mind Control


by John P. Thomas
Health Impact News

It’s been nearly nine months since the word “Zika” flashed like a lightning bolt in the headlines of mainstream news. Before January 1, 2016, Zika was just one of many viruses that public health officials monitored. But suddenly in January of this year everything changed, as a nearly harmless virus was transformed into a worldwide threat.
As we will see, the Zika propaganda machine was turned on in October of 2015 and it has been running wild ever since. This is a classic example of a mind control program, a public brainwashing project, or a high powered marketing campaign.
Regardless of what you call it, it is clear that the mainstream news media, the World Health Organization (WHO), the Pan American Health Organization (PAHO), the US Centers for Disease Control and Prevention (CDC), Big Pharma, Big Chem, and both Republicans and Democrats have joined forces to sell a Zika eradication program to the people of the United States and to the rest of the world.
This has been and continues to be one of the best orchestrated programs of propaganda in recent history. This article will discuss how the program started, how it has been developed, and where it is going.

Zika is not a Threat to the Babies of the World


Just to be absolutely clear from the beginning, there is no solid evidence that Zika is a threat to humanity. It is a minimally dangerous viral infection, which does not cause microcephaly.

Wednesday, 31 August 2016

जीएम बीज, कृषि उत्पादकता और राजनीतिक छल - उत्तम भारतीय सनातन खेती को खत्म करने का प्रयास

http://hindi.krishibhoomi.in/Haryana.aspx
ऐतिहासिक तौर पर भारत के किसानों ने दुनिया को यह साबित कर दिखाया था कि चाहे अनाज की जरूरत जितनी भी हो, सब कुछ जैविक और टिकाऊ खेती द्वारा उपजाया जा सकता है और यह काम अनंत काल तक किया जा सकता है । कुदरती खेती करने वाले किसान न सिर्फ हमारा बल्कि धरती की सेहत का भी खयाल रखते हैं । वह पूरे विश्व के अन्नदाता हैं | दुनिया की भूख और भुखमरी का हल उन्हीं के हाथों में है ।
(श्री अरुण श्रीवास्तव ने यह लेख २०१३ में लिखा था जिसे आप अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं --

http://jaagatiduniya.blogspot.co.uk/2016/08/india-genetically-modified-seeds.html )

मनमोहन सिंह और शरद पवार ने जी-एम (जेनेटकली माडिफाइड अर्थात् आनुवांशिक रूप से संशोधित) बीजों पर आधारित जीन क्रांति के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि के दोषपूर्ण वैज्ञानिक कल्पना को आगे बढ़ाया है । मोन्सांटो की मनगढ़ंत कहानियों पर उन्हें अटल विश्वास है । दोनों को ही कृषि विज्ञान और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन पढ़ने की जरूरत है मगर समस्या यह है कि वह यह समझ नहीं सकते हैं ।
कुछ उल्लेखनीय अपवादों को छोड़कर ज्यादातर कृ्षि वैज्ञानिक भी नीम हकीमों के जादू के वश में हैं और यह समझते हैं कि हमारे किसान आदिम और अवैज्ञानिक हैं इसलिये उन्हें  `आधुनिक तकनीक’ अपनाना चाहिये ।

असफल हरित क्रांति को जबरन आगे बढ़ाने वाले धोखेबाज अब विफल जीन क्रांति के तकनीकी छल को आगे बढ़ा रहे हैं । वह उन सभी साक्ष्य आधारित विज्ञान को अस्वीकार करते हैं जो नई मनगढ़ंत कहानियों पर टिके उनके अंधे विश्वास को कमजोर करता है । मोन्सांटो के तथाकथित सफलता के पुजारी इन लोगों ने उन जातीय सफाया  (यूजेनिक्स) का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों, सार्वभौमिक रसायन, अन्न और बीज उत्पादकों के सामने मस्तक झुकाना पसंद किया है जिन्होंने अन्न को मानव जाति की पीड़ा और संहार का हथियार बना दिया है । भारतीय पारंपरिक कृषि की निष्पक्ष समीक्षा किये बिना यह लोग भूतपूर्व उपनिवेशवादियों की तरह भारतीय किसानों को बदनाम करते रहते हैं । अगर भारतीय खेती प्रथा वास्तव में `सदियों से गतिहीन’ है और भूख, अपर्याप्त पोषण और गरीबी का कारण थी तो इन वैज्ञानिकों के पूर्वज खत्म हो गये होते ।

ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ और आज के हालात
भारत में ऋग्वेद के दिनों [ ८००० ई.पू से ६००० ई.पू] से अर्थशास्त्र [लगभग ३२० ई.पू] और मध्ययुगीन अवधि के दौरान की कृषि प्रबंधन पर हजारों पाण्डुलिपियाँ हैं मगर अंग्रेज उपनिवेशवादियों ने भूमि प्रबंधन प्रथाओं को समझे बिना बददिमाग वैज्ञानिकों की कहानियों पर ज्यादा भरोसा किया । ब्रिटेन ने अपने भोजन-के-लिये-अन्तहीन-युद्ध की अनंत क्षुधा को तृप्त करर्ने के लिये भारत को सदियों लूटा । नकद के लिये सर्वश्रेष्ठ खेतों में खाद्य फसलों को नष्ट कर अफीम और नील की खेती कराई गयी । कई दशकों तक अनुसंधान और क्षेत्र परीक्षण के बाद ( जिसकी शुरुआत १९०५ में हुई थी) , सर ऐल्बर्ट हावर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय किसान कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे, उनका किया मिट्टी की उर्वरता का प्रबंधन दरअसल बेहतर था । उनका जैविक विधि का समर्थन नये तकनीकों का भय नहीं बल्कि पश्चिम देशों में हो रहे उपज लाभ के बावजूद अजैविक रासायनिक खेती के खिलाफ विज्ञान आधारित विरोध था ।
तालिका १ – १८९० में गेहूँ खेती के मुख्य क्षेत्रों में औसत उपज
देश
भारत
ब्रिटेन
फ्रांस
जर्मनी
रूस
कैनडा
अमेरिका
औस्ट्रेलिया
किलो प्रति हेक्टयर
६४८
१८१४.४
११०१.६
११६६.४
५८३.२
९०७.२
८१०
७१२.८
यूरोप के मुख्य गेहूँ खेती के इलाकों की उपज मध्य उत्तर प्रदेश और गंगा क्षेत्र से कहीं कम थी । १८९० में भारतीय किसान रासायनिक खेती के बिना ब्रिटेन की उपज से दुगुना धान उगा रहे थे और औसत उपज ५६ बुशेल (बुशेल -३२ सेर का तौल) प्रति हेक्टेयर थी । सभी पश्चिमी देशों में भारत के सर्वोतम खेती की उपज के मुकाबले आधे से भी कम उपज होती थी  । जैसा कि १७६०-६४ के ब्रिटिश रिकार्ड्स बताते हैं चेंगलपट्टू इलाके के गांवों मे चावल की पैदावार १२ लाख टन प्रति हेक्टेयर थी ।  क्या यह कृषि वैज्ञानिकों का प्राथमिक काम नहीं था कि १७६० के खेती के अभिलेखों का अद्ययन करें और हजारों साले की मेहनत से हासिल किये इन बेहतरीन तरीकों को अपनायें, जिनके बारे सर हावर्ड ने लिखा कि `महासागरों और अमेरिका के प्रेयरी चारागाह की तरह प्राकृतिक और मौलिक था ? ‘